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आर्थोपेडिक कंसल्टेंशन कैम्प में 150 रोगियों की जांच की गई

विनय कुमार  ( मोहाली ) : शैल्बी हॉस्पिटल, मोहाली द्वारा स्वास्तिक आरोग्य नर्सिंग होम भानुपाली, आनंदपुर साहिब में एक फ्री आर्थोपेडिक कंसल्टेंशन कैम्प में 150 से अधिक रोगियों की जांच की गई । कैम्प में शैल्बी के संस्थापक चेयरमैन, प्रबंध निदेशक और देश के प्रसिद्ध ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ.विक्रम शाह की टीम, जिसमें डॉ. मोहित गुप्ता,  रिप्लेसमेंट सर्जन भी शामिल थे, द्वारा घुटने और कूल्हे के दर्द और अन्य आर्थोपेडिक समस्याओं के बारे में कंसल्टेंशन व फ्री फिजियोथेरेपी सर्विसेज भी दी गई । कैम्प के दौरान मरीजों को फ्री फिजियोथेरेपी सर्विसेज भी दी गई । इस मौके पर स्वास्तिक आरोग्य नर्सिंग होम के मालिक डॉ विशाल जगोता भी मौजूद थे। उल्लेखनीय है कि डॉ. शाह भारत के अग्रणी ऑर्थोपेडिक सर्जनों में से एक हैं और सर्जनों और पैरामेडिक्स की अपनी टीम के साथ दुनिया में सबसे अधिक ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरीज कर चुके हैं। डॉ. शाह, फाउंडर चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, शैल्बी अस्पताल ने कहा ,  माना जाता है कि पश्चिमी देशों में भारतीय लोगों में घुटनों के दर्द के मामले 15 गुना ज्यादा है। अमेरिका, जिसकी आबादी 30 करोड़ से अधिक है, में हर साल 7 लाख टोटल नी रिप्लेसमेंट सर्जरीज हर साल की जाती हैं, लेकिन भारत में इन सर्जरी का आंकड़ा सिर्फ 150,000 ही है। उन्होंने कहा कि हालांकि यह 1994 में भारत में की जाने वाली सिर्फ 350 नी सर्जरीज के मुकाबले एक बड़ी छलांग है। देश की बड़ी आबादी और घुटनों के गठिया के रूझानों को देखते हुए कहा जा सकता है कि देश में हर साल एक करोड़ घुटनों की सर्जरी की जरूरत है, जो कि नहीं हो पा रही हैं। इसकी तुलना में, भारत में 2022 तक हर साल लगभग एक मिलियन यानि 10 लाख नी रिप्लेसमेंट को ही होते हुए देखा जा सकेगा। डॉ.शाह ने जोर देकर कहा कि आज नी रिप्लेसमेंट में बहुत कम इंफेक्शन दर है और अस्पताल में भी काफी कम समय रहना पड़ता है।नी अर्थराइटिस यानि घुटने के गठिया के अगले एक दशक में भारत में शारीरिक विकलांगता के चौथे सबसे आम कारण के रूप में उभरने की उम्मीद है।डॉ.शाह ने कहा कि हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑर्थाेपेडिक स्पेशलिस्ट्स की कमी के चलते इस समस्या को संभालना काफी मुश्किल होगा और इससे देश के हेल्थकेयर पर काफी बोझ भी पड़ेगा। डॉ.शाह ने कहा कि घुटने के गठिया में तेजी से वृद्धि का एक प्रमुख कारण यह है कि भारत में आजादी के बाद से औसत आयु भी बढ़ कर करीब दोगुना हो गई है। इससे देश में बढ़ती उम्र की आबादी काफी बढ़ गई है और वे घुटनों की कई सारी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

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